गाँव मंच, उत्तर प्रदेश 16 मई। मैनपुरी जिले का एक छोटा सा गांव—मार्कण्ड बिधूना। यह सिर्फ एक पैतृक स्मृति नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत की असीम संभावनाओं का जीवंत उदाहरण है। करीब सात दशक पहले जिस गांव से परिवार का रिश्ता छूट गया था, वहां लौटना एक गहरा भावनात्मक अनुभव रहा। गांव के लोगों का अपनापन, पुरखों की स्मृतियां और खेतों के बीच बसी सहज जीवन-शैली यह भरोसा जगाती है कि यदि सही दिशा मिले, तो हमारे गांव फिर से आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिख सकते हैं।
बिधूना की सबसे बड़ी ताकत उसकी उपजाऊ जमीन, श्रमशक्ति और सामाजिक आत्मीयता है। आज मशीनी खेती के कारण गांवों में बहुत-से हाथ खाली हो गए हैं, जबकि खेतों से निकलने वाला कृषि अपशिष्ट (Crop Waste) अक्सर बेकार समझकर छोड़ दिया जाता है। यही अपशिष्ट यदि सही तकनीक, प्रशिक्षण और बाजार से जोड़ा जाए, तो किसानों, महिलाओं और युवाओं के लिए अतिरिक्त आय का बड़ा स्रोत बन सकता है।
वेस्ट टू वेल्थ: कचरे से कमाई का मॉडल
बिधूना भारत के करीब 7 लाख गांवों का प्रतिनिधि उदाहरण है। “वेस्ट टू वेल्थ” यानी कचरे से कमाई का विचार यहाँ धरातल पर उतारा जा सकता है:
- स्थानीय संसाधन: फसल अवशेष, प्राकृतिक रेशे, पत्ते, तने, गोबर और जैविक सामग्री।
- संभावित उत्पाद: हस्तनिर्मित उत्पाद, टिकाऊ पैकेजिंग सामग्री, जैविक खाद, सजावटी वस्तुएं और ग्रामीण क्राफ्ट।
- आर्थिक लाभ: इससे खेत का अपशिष्ट गांव की अर्थव्यवस्था में वापस लौटेगा और हर खाली हाथ को काम मिल सकेगा।

वर्क फ्रॉम विलेज: बदल सकती है काम की संस्कृति
बिधूना में प्रवास के दौरान घने पेड़ों और खेतों के बीच लैपटॉप पर काम करने का अनुभव यह सोचने पर मजबूर करता है कि अब का
म की संस्कृति को बदलने का समय आ गया है। बहुमंजिला वातानुकूलित (AC) इमारतों से आगे बढ़कर प्रकृति के सानिध्य में भी काम संभव है।
कल्पना कीजिए, एक ओर गांव का कारीगर स्थानीय संसाधनों से सुंदर उत्पाद बना रहा हो और पास ही बैठा कोई मार्केटिंग पेशेवर उसकी ब्रांडिंग, डिजिटल बिक्री और बाजार रणनीति तैयार कर रहा हो। यह मॉडल गांवों को केवल उत्पादन केंद्र नहीं, बल्कि रचनात्मक कार्यस्थल और ग्रामीण नवाचार केंद्र (Rural Innovation Hub) बना देगा।

धार्मिक पर्यटन से खुलेगी नई राह
मार्कण्ड बिधूना का धार्मिक और पौराणिक महत्व भी इसे एक विशेष पहचान देता है। यहाँ स्थित मार्कंडेय ऋषि मंदिर और पवित्र कुंड का हालिया सौंदर्यीकरण गांव को धार्मिक पर्यटन से जोड़ने की अद्भुत क्षमता रखता है। हरे-भरे खेतों के बीच लाल बलुआ पत्थर से बना यह मंदिर परिसर शांति, आस्था और प्राकृतिक सौंदर्य का संगम है। यदि इसे स्थानीय उत्पादों और ग्रामीण उद्यमिता से जोड़ा जाए, तो गांव के लिए एक स्थायी आयधारा तैयार हो सकती है।
बदलाव की एक खुली अपील
इस पहल का उद्देश्य केवल रोजगार देना नहीं, बल्कि गांव की गरिमा, युवाओं का भरोसा और महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ाना है। बेटियों को बेहतर शिक्षा और सुरक्षित भविष्य तभी मिलेगा जब गांव आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होंगे। इसके लिए किसी अनुभवी एनजीओ (NGO), सामाजिक संस्था, कॉरपोरेट CSR विंग, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म और स्थानीय प्रशासन के साझा सहयोग की जरूरत है।

यदि कोई सामाजिक कार्यकर्ता, तकनीकी विशेषज्ञ, उद्यमी या सीएसआर इकाई इस ग्रामीण समृद्धि के मॉडल से जुड़ना चाहती है, तो मार्कण्ड बिधूना एक आदर्श प्रयोगशाला बन सकता है। यहाँ संसाधन हैं, लोग हैं, विरासत है और सबसे बढ़कर बदलाव की इच्छा भी है। पुरखों की धरती से जुड़ना केवल भावनात्मक वापसी नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी है ताकि ग्रामीण भारत आत्मसम्मान के साथ आगे बढ़ सके।
- उत्तर प्रदेश में ग्रामीण विकास, कृषि और पंचायत स्तर की योजनाओं की विस्तृत जानकारी के लिए ग्राम्य विकास विभाग, उत्तर प्रदेश की आधिकारिक वेबसाइट देखें।
- ‘वेस्ट टू वेल्थ’ (कचरे से कमाई) और ग्रामीण आजीविका मिशन के बारे में अधिक जानने के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) के पोर्टल पर विजिट करें।
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-लेखक के के कुलश्रेष्ठ वरिष्ठ आर्थिक पत्रकार हैं और देश के प्रमुख समाचार पत्रों से जुड़े रहे हैं।


