गाँव मंच डेस्क| डूंगरपुर
राजस्थान के आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में महिलाएं हमेशा से खेतों में रही हैं, बीज बोना, निराई करना, फसल काटना और पशुपालन संभालना।
लेकिन सालों तक यह मेहनत “मदद” कहलाती रही, पहचान नहीं। खेतों में उनका पसीना तो दिखा, लेकिन फैसलों में उनकी आवाज़ नहीं सुनी गई।

अब यह तस्वीर बदल रही है। डूंगरपुर, बांसवाड़ा और प्रतापगढ़ जैसे जिलों में महिलाएं स्वयं सहायता समूहों के जरिए खेती को नए ढंग से आगे बढ़ा रही हैं। ये महिलाएं अब सिर्फ मजदूर नहीं, बल्कि योजनाकार और निर्णय लेने वाली किसान बन चुकी हैं। वे खुद तय करती हैं कि कौन-सी फसल बोई जाएगी, किस मौसम में क्या उगाना है, और तैयार उपज को बाजार तक कैसे पहुंचाना है।
सब्ज़ी उत्पादन, देसी बीज संरक्षण और फसल प्रसंस्करण को इन्होंने सिर्फ खेती नहीं, आजीविका का मजबूत साधन बनाया है। टमाटर, मिर्च, भिंडी जैसी सब्ज़ियों से लेकर स्थानीय बीजों के संरक्षण तक, महिलाएं अब हर स्तर पर सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। कुछ समूह सब्ज़ियों की ग्रेडिंग और पैकेजिंग कर बाजार में सीधे बिक्री भी कर रहे हैं, जिससे बिचौलियों पर निर्भरता कम हुई है।
इस बदलाव का असर सिर्फ आमदनी तक सीमित नहीं है। महिलाओं की कमाई से घरों में बच्चों की पढ़ाई, पोषण और स्वास्थ्य पर सकारात्मक असर पड़ा है। कई परिवारों में अब महिलाओं की राय खेती के साथ-साथ घरेलू फैसलों में भी अहम मानी जाने लगी है।
गांवों में जहां पहले महिलाएं चुपचाप काम करती थीं, आज वहीं बैठकों में बोलती हैं, हिसाब-किताब रखती हैं और नई महिलाओं को समूह से जोड़ती हैं।
खेत अब उनके लिए सिर्फ मेहनत की जगह नहीं रहे, बल्कि आत्मविश्वास और नेतृत्व की जमीन बन गए हैं।
यह कहानी सिर्फ खेती की नहीं है। यह उस बदलाव की कहानी है, जहां मिट्टी के साथ-साथ महिलाओं की पहचान भी मजबूत हो रही है, जहां खेतों में सिर्फ फसल नहीं, बल्कि नेतृत्व की नई फसल उग रही है।


