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कृषि मशीनीकरण से गांवों में रोजगार का संकट, ग्रामीण औद्योगीकरण जरूरी

गांवमंच डेस्क। कृषि मशीनीकरण ने भारतीय खेती के तौर-तरीकों को तेजी से बदल दिया है। कंबाइन हार्वेस्टर, ट्रैक्टर और जेसीबी जैसी मशीनों की मदद से अब कई ऐसे काम कुछ घंटों में पूरे हो जाते हैं, जिनमें पहले कई दिन लगते थे। इससे किसानों का समय बच रहा है और खेती के कई काम आसान हुए हैं। हालांकि, इस बदलाव के साथ ग्रामीण रोजगार, किसानों की आय और खेतिहर मजदूरों की आजीविका से जुड़े सवाल भी सामने आ रहे हैं।

वरिष्ठ पत्रकार और आर्थिक विषयों के जानकार केके कुलश्रेष्ठ ने अपने गांव मारकंड बिधूना के अनुभवों के आधार पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था के इसी पहलू को रेखांकित किया है। उनका मानना है कि खेती में मशीनों से बचने वाले समय और श्रम को दूसरी उत्पादक गतिविधियों से जोड़ना जरूरी है। इसके लिए कृषि के आधुनिकीकरण के साथ ग्रामीण औद्योगीकरण पर भी ध्यान देना होगा।

दो घंटे में कट गई दस बीघा धान की फसल

उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले के मारकंड बिधूना गांव में कृषि मशीनीकरण का एक उदाहरण धान की कटाई के दौरान देखने को मिला। गांव के किसान सुमित मिश्रा ने दस बीघा खेत की धान की फसल कटवाने के लिए कंबाइन हार्वेस्टर की मदद ली। मशीन ने महज दो घंटे में कटाई पूरी कर दी, जिसके लिए 7,000 रुपये खर्च हुए।

पहले इसी तरह की कटाई में किसानों और खेतिहर मजदूरों को कई दिन तक मेहनत करनी पड़ सकती थी। मशीनों ने इस काम में लगने वाला समय काफी कम कर दिया है। लेकिन इससे एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है कि खेती में बचने वाले समय का इस्तेमाल किसान और उसके परिवार के सदस्य किस तरह कर रहे हैं।

गांवों में ट्रैक्टर और जेसीबी का बढ़ता इस्तेमाल

ग्रामीण क्षेत्रों में ट्रैक्टर और जेसीबी जैसी मशीनों का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है। खेतों की जुताई, जमीन समतल करने और अन्य कृषि कार्यों में इन मशीनों से काफी समय बचता है। मारकंड बिधूना में लेखक के अनुभव के अनुसार, इन मशीनों का किराया करीब 1,000 से 1,200 रुपये प्रति घंटे बताया गया।

किसानों के लिए मशीनों का इस्तेमाल कई परिस्थितियों में व्यावहारिक विकल्प है। मजदूरों की उपलब्धता, बढ़ती मजदूरी और कृषि कार्यों को समय पर पूरा करने की जरूरत के कारण मशीनें उपयोगी साबित होती हैं। विशेष रूप से बुवाई और कटाई जैसे महत्वपूर्ण चरणों में देरी से फसल प्रभावित होने का जोखिम रहता है।

मजदूरी, मनरेगा और ग्रामीण रोजगार के बदलते अवसर

  • ग्रामीण क्षेत्रों में मजदूरों की उपलब्धता और मजदूरी की लागत पर कई कारकों का असर पड़ता है।
  • मनरेगा जैसे ग्रामीण रोजगार कार्यक्रमों ने ग्रामीण परिवारों को मजदूरी आधारित काम का एक वैकल्पिक अवसर दिया है।
  • इसके अतिरिक्त, शहरों में निर्माण, परिवहन और सेवा क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढ़ने से भी कुछ श्रमिक गांवों से बाहर काम तलाशते हैं।
  • श्रमिकों को बेहतर मजदूरी और रोजगार के दूसरे विकल्प मिलना सकारात्मक बदलाव हो सकता है।
  • दूसरी ओर, कृषि कार्यों में मजदूरों की कमी या बढ़ती लागत के कारण किसान मशीनों की ओर रुख कर सकते हैं।

समस्या मशीनों के इस्तेमाल या मजदूरी बढ़ने में अपने-आप नहीं है। असली चुनौती यह है कि खेती से निकलने वाले श्रम को दूसरी आर्थिक गतिविधियों में लगाने के लिए पर्याप्त अवसर उपलब्ध हों। यदि ग्रामीण श्रमिक कृषि से हटकर किसी उद्योग, प्रसंस्करण इकाई या सेवा क्षेत्र में बेहतर आय अर्जित करने लगें, तो यह आर्थिक प्रगति होगी। लेकिन वैकल्पिक रोजगार के अभाव में उनकी आजीविका प्रभावित हो सकती है।

छोटी जोतों पर कृषि मशीनीकरण का अर्थशास्त्र

  • ग्रामीण भारत में भूमि का पीढ़ियों के बीच बंटवारा होने से अनेक किसानों के पास छोटी जोतें रह गई हैं।
  • मारकंड बिधूना जैसे क्षेत्रों में पांच या दस बीघा जमीन वाले किसान भी हैं।
  • ऐसी स्थिति में महंगी कृषि मशीन खरीदना और उसका रखरखाव करना छोटे किसानों के लिए मुश्किल हो सकता है।
  • किराये पर कंबाइन हार्वेस्टर और ट्रैक्टर उपलब्ध होने से छोटे किसानों को मशीन खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती।
  • वे जरूरत के अनुसार मशीनों का इस्तेमाल कर सकते हैं और समय पर कृषि कार्य पूरे कर सकते हैं।
  • फिर भी, मशीन से होने वाली वास्तविक बचत का आकलन करते समय केवल किराये या मजदूरी की तुलना पर्याप्त नहीं है।
  • इसमें बीज, खाद, सिंचाई, मशीन का खर्च, कुल उत्पादन, फसल का बाजार भाव और पूरे साल की कृषि आय को भी शामिल करना चाहिए।
  • मशीनीकरण से किसी एक काम की लागत घट सकती है, लेकिन किसान की कुल आय में वृद्धि तभी होगी जब उत्पादन,
  • बाजार से मिलने वाली कीमत या खेती की समग्र आर्थिक दक्षता में पर्याप्त सुधार हो।

खेती में अल्परोजगार और अदृश्य बेरोजगारी की चुनौती

  • कृषि मशीनीकरण के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था में अल्परोजगार और अदृश्य बेरोजगारी का सवाल भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
  • अल्परोजगार की स्थिति में व्यक्ति अपनी उपलब्ध क्षमता के अनुसार काम या आय हासिल नहीं कर पाता।
  • वहीं, अदृश्य बेरोजगारी में किसी काम में जरूरत से अधिक लोगों के लगे होने के बावजूद कुछ
  • श्रमिकों का अतिरिक्त योगदान कुल उत्पादन में बहुत कम बढ़ोतरी करता है।
  • छोटी जोत वाले परिवारों में कई सदस्य खेती से जुड़े रहते हैं, लेकिन उनके श्रम का पूरा उत्पादक इस्तेमाल नहीं हो पाता।
  • जब मशीनें कृषि के कई काम कम समय में पूरा कर देती हैं और दूसरी जगह रोजगार उपलब्ध नहीं होता, तब यह समस्या अधिक स्पष्ट हो सकती है।
  • हालांकि, ग्रामीण बेरोजगारी के पीछे केवल मशीनीकरण ही जिम्मेदार नहीं है।
  • सीमित भूमि, गैर-कृषि रोजगार की कमी, कौशल संबंधी बाधाएं
  • और ग्रामीण उद्योगों का अपर्याप्त विकास भी इसके महत्वपूर्ण कारण हैं।
  • इसलिए समाधान खेती को फिर से श्रम-प्रधान बनाने में नहीं,
  • बल्कि कृषि से जुड़े लोगों के लिए अतिरिक्त आय और रोजगार के अवसर पैदा करने में है।

ग्रामीण औद्योगीकरण से खुल सकते हैं रोजगार के नए रास्ते

  • ग्रामीण रोजगार की चुनौती से निपटने के लिए कृषि के साथ ग्रामीण औद्योगीकरण को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण हो सकता है।
  • हर गांव में बड़ी फैक्टरी स्थापित करना जरूरी नहीं है। स्थानीय संसाधनों, कौशल और
  • बाजार की मांग के आधार पर छोटे उद्योगों और उद्यमों का विकास भी रोजगार के अवसर पैदा कर सकता है।
  • इसके लिए कृषि उपज की सफाई, छंटाई, प्रसंस्करण, पैकेजिंग और भंडारण जैसी गतिविधियों को बढ़ावा दिया जा सकता है।
  • इसके अतिरिक्त, कृषि मशीनों की मरम्मत, निर्माण से जुड़ी सेवाएं, पशुधन आधारित उद्यम और
  • स्थानीय उत्पादन इकाइयां भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को विविध बनाने में योगदान दे सकती हैं।
  • ग्रामीण महिलाओं के लिए सिलाई, वस्त्र निर्माण और अन्य उत्पादन गतिविधियों को बाजार से जोड़ना भी उपयोगी हो सकता है।
  • हालांकि, केवल प्रशिक्षण देने या मशीनें उपलब्ध कराने से रोजगार टिकाऊ नहीं बनता।
  • उत्पादों की मांग, नियमित ऑर्डर, वित्त, परिवहन, गुणवत्ता और उचित भुगतान की व्यवस्था भी जरूरी है।

ग्रामीण विकास की कसौटी रोजगार और आय भी हो

  • कृषि मशीनीकरण और तकनीकी विकास को केवल समय की बचत या उत्पादन में वृद्धि के आधार पर नहीं देखना चाहिए।
  • यह भी समझना जरूरी है कि इन बदलावों से किसानों की कुल आय में कितना सुधार हुआ
  • और खेती में कम होते श्रम की भरपाई के लिए दूसरे रोजगार कितने उपलब्ध हुए।
  • नीतियों के मूल्यांकन में नियमित रोजगार, वास्तविक आय में वृद्धि, काम की स्थिरता
  • और स्थानीय उद्यमों की आर्थिक व्यवहार्यता जैसे संकेतकों को भी महत्व देना चाहिए।
  • ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए बेहतर सड़क, बिजली, पानी
  • और अन्य बुनियादी सुविधाओं के साथ ऐसे आर्थिक अवसरों की जरूरत है,
  • जिनसे गांवों में रहने वाले लोग अपनी क्षमता का पूरा उपयोग कर सकें।
  • कृषि मशीनीकरण को रोकना न व्यावहारिक है और न ही इसका उद्देश्य होना चाहिए।
  • जरूरत इस बात की है कि मशीनों से बचने वाले समय और श्रम को अधिक उत्पादक गतिविधियों से जोड़ा जाए।

गांवमंच डेस्क

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