गांव मंच डेस्क, हरियाणा | महेंद्रगढ़ समेत दक्षिणी जिलों में किसान तेजी से कपास की खेती से दूरी बना रहे हैं। गुलाबी सुंडी के बढ़ते प्रकोप, खेती की बढ़ती लागत और मौसम की अनिश्चितता के कारण किसान अब बाजरा और ग्वार जैसी फसलों की ओर रुख कर रहे हैं। इसका असर कपास के रकबे पर साफ दिखाई दे रहा है, जो घटकर सात वर्षों के सबसे निचले स्तर 2.82 लाख हेक्टेयर पर पहुंच गया है।
सरकार दे रही बाजरा उत्पादन को बढ़ावा
हरियाणा सरकार किसानों को उन्नत बाजरा बीज अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। ये किस्में अधिक उत्पादन देने के साथ-साथ गर्मी और बीमारियों का बेहतर सामना कर सकती हैं। इसके अलावा अटल भूजल योजना के तहत ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई जैसी आधुनिक तकनीकों पर भी जोर दिया जा रहा है, जिससे कम पानी में बेहतर उत्पादन संभव हो रहा है।
बाजरा प्रसंस्करण इकाइयों को मिल रही सब्सिडी
राज्य सरकार बाजरा आधारित उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए विशेष कदम उठा रही है। बाजरा प्रसंस्करण इकाइयां स्थापित करने वाले उद्यमियों को बैंक ऋण पर 7 प्रतिशत तक ब्याज सब्सिडी दी जा रही है। इससे बाजरे का आटा, बिस्कुट और अन्य उत्पाद बनाने वाले छोटे उद्योगों को बढ़ावा मिल रहा है, वहीं किसानों की उपज की मांग भी बढ़ रही है।

कपास में गुलाबी सुंडी बनी बड़ी चुनौती
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, कपास की फसल में गुलाबी सुंडी (पिंक बॉलवर्म) का बढ़ता प्रकोप किसानों के लिए गंभीर समस्या बन गया है। यह कीट फसल को भारी नुकसान पहुंचाता है और अब बीटी कपास भी इससे पूरी तरह सुरक्षित नहीं मानी जा रही। लगातार नुकसान के कारण किसानों की लागत बढ़ रही है और मुनाफा घट रहा है।
दक्षिण हरियाणा में बढ़ा बाजरा और ग्वार का रुझान
महेंद्रगढ़, झज्जर, भिवानी और चरखी दादरी जैसे जिलों में किसान अब बाजरा और ग्वार की खेती को प्राथमिकता दे रहे हैं। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि दक्षिण हरियाणा की मिट्टी बाजरा उत्पादन के लिए अधिक उपयुक्त है। यही वजह है कि यहां के किसान कम पानी और कम लागत वाली फसलों को अपना रहे हैं।
MSP और भावांतर योजना से मिल रहा लाभ
विशेषज्ञों का कहना है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP), भावांतर भरपाई योजना और मिलेट्स को बढ़ावा देने वाली सरकारी नीतियों ने बाजरा किसानों का भरोसा बढ़ाया है। बाजरा एक सूखा सहन करने वाली फसल है, जिसे कम पानी और कम निवेश में सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। यही कारण है कि हरियाणा के कई किसान अब कपास छोड़कर बाजरा की खेती को बेहतर विकल्प मान रहे हैं।
लेखिका: हीना शर्मा


