गाँव मंच डेस्क जैसलमेर। थार मरुस्थल का नाम आते ही आंखों के सामने सूखी रेत, तपता सूरज और खाली खेतों की तस्वीर उभरती है। दशकों तक यहां के किसानों ने खेती को मजबूरी में छोड़ा, गांवों से शहरों की ओर पलायन किया और अपनी जमीन को किस्मत के भरोसे छोड़ दिया।

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में थार की इसी रेत में एक नई कहानी लिखी जा रही है, जिंदा रहने की नहीं, बल्कि आगे बढ़ने की खेती की कहानी।
जैसलमेर और बाड़मेर के कई गांवों में किसान अब पारंपरिक खेती से हटकर कम पानी वाली तकनीकों को अपना रहे हैं। ड्रिप सिंचाई, प्लास्टिक मल्चिंग, खेत-तालाब और वर्षा जल संग्रहण ने खेती का गणित बदल दिया है।
जहां पहले एक फसल भी मुश्किल से होती थी, आज वहीं साल में दो से तीन फसलें ली जा रही हैं।
यह बदलाव अचानक नहीं आया। वर्षों की असफलताओं, सूखे और कर्ज के बाद किसानों ने समझा कि अगर खेती को बचाना है तो सोच बदलनी होगी।
आज थार का किसान मौसम को कोसने के बजाय योजना बनाता है। पानी की हर बूंद को पूंजी मानता है और खेती को जोखिम नहीं, रणनीति मानकर करता है।
इस बदलाव ने गांवों की सामाजिक तस्वीर भी बदली है। जो युवा कभी शहरों में मजदूरी कर रहे थे, वे अब गांव लौट रहे हैं। खेती अब उनके लिए शर्म नहीं, पहचान बन रही है।


