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गांवों से सीख रही दुनिया, विदेशी छात्रों ने बढ़ाई स्थानीय उत्पादों की पहचान

गांव मंच डेस्क | अब गांवों में कुछ नया हो रहा है। यहां विदेशी छात्र सीखने आते हैं। वे गांवों में रहते हैं, किसानों से खेती सीखते हैं, महिलाओं के छोटे कारोबार को समझते हैं और स्थानीय संस्कृति को करीब से देखते हैं। इससे उन्हें नई सीख मिलती है और गांवों को नई कमाई।

गांवों को समझने की सोच से शुरू हुई पहल

वैष्णवी सोमानी ने “लोकल नैरेटिव्स” की शुरुआत की। उनका उद्देश्य गांवों को सीखने की जगह के रूप में पहचान दिलाना था। इस पहल के तहत छात्रों को गांवों में रहकर वहां के जीवन, संस्कृति और आजीविका को समझने का मौका दिया जाता है।

आज इस पहल से जुड़े 50 गांव देश के अलग-अलग राज्यों में मौजूद हैं। ऑस्ट्रेलिया और जापान के कई स्कूलों और विश्वविद्यालयों के छात्र यहां आकर सीख रहे हैं कि गांव किस तरह अपनी परंपराओं, संसाधनों और सामुदायिक सहयोग के दम पर आगे बढ़ते हैं।

किसानों से सीख रहे हैं विदेशी छात्र

इन यात्राओं के दौरान छात्र किसानों के साथ खेतों तक जाते हैं। वे खेती के तौर-तरीके, स्थानीय फसलों, जल प्रबंधन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को समझते हैं।

किताबों में पढ़ी जाने वाली कई बातें उन्हें गांवों में जाकर व्यवहारिक रूप में देखने को मिलती हैं। इससे छात्रों को खेती और खाद्य उत्पादन की पूरी प्रक्रिया को करीब से जानने का अवसर मिलता है।

टोटोपारा की कहानी बनी मिसाल

पश्चिम बंगाल का टोटोपारा गांव दुनिया की सबसे छोटी जनजातियों में शामिल टोटो समुदाय का घर है। यहां करीब 1700 लोग रहते हैं। गांव के स्कूल में एक अतिरिक्त कमरे की जरूरत थी। वहीं गांव की महिलाएं अपने पारंपरिक खानपान को बचाने और उससे आय बढ़ाने के लिए एक कैफे शुरू करना चाहती थीं।
इसी दौरान बेंगलुरु की क्राइस्ट यूनिवर्सिटी के 14 छात्र 10 दिन के लिए गांव पहुंचे। उन्होंने महिलाओं के साथ मिलकर कैफे का मेन्यू तैयार किया, कीमतें तय करने में मदद की और कारोबार का मॉडल बनाया।
इस पहल से गांव को करीब 6 लाख रुपये की आय हुई। इसी राशि से स्कूल में नया कमरा तैयार हुआ और महिलाओं का कैफे भी शुरू हो गया। यह उदाहरण बताता है कि सीखने और स्थानीय विकास को साथ-साथ कैसे आगे बढ़ाया जा सकता है।

महिलाओं और कारीगरों को मिला नया बाजार

इस पहल का लाभ केवल छात्रों तक सीमित नहीं है। कई गांवों में महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों और कारीगरों को भी नए अवसर मिले हैं।

गोवा के असनोरा गांव में बुनकर महिलाओं को खरीदारों से जोड़ा गया, जिससे उनकी आय बढ़ी। वहीं स्थानीय हस्तशिल्प, पारंपरिक खाद्य पदार्थों और अन्य उत्पादों को भी नया बाजार मिला।

विदेशी छात्रों और आगंतुकों के आने से गांवों में बने उत्पादों की पहचान बढ़ रही है और स्थानीय लोगों की कमाई के नए रास्ते खुल रहे हैं।

विदेशी छात्रों और आगंतुकों के आने से महिलाओं के उत्पादों को नया बाजार और पहचान मिल रही है।

नई शिक्षा नीति की सोच को मिल रही मजबूती

नई शिक्षा नीति 2020 अनुभव आधारित शिक्षा पर जोर देती है। इसका उद्देश्य छात्रों को केवल किताबों तक सीमित न रखकर वास्तविक जीवन से जोड़ना है।

भारतीय गांवों में चल रहा यह मॉडल इसी सोच को मजबूत करता है। यहां छात्र सामाजिक उद्यमिता, सामुदायिक विकास, खेती और स्थानीय अर्थव्यवस्था को करीब से समझते हैं। यही कारण है कि यह पहल केवल पर्यटन नहीं, बल्कि सीखने का माध्यम बन गई है।

IIM बेंगलुरु ने भी दी मान्यता

लोकल नैरेटिव्स ने गांवों में सीखने के लिए पांच दिन का विशेष पाठ्यक्रम तैयार किया है। इस कार्यक्रम को भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM) बेंगलुरु ने भी मंजूरी दी है।

इसका मतलब है कि गांवों में जाकर सीखने वाले छात्रों को अकादमिक क्रेडिट यानी पढ़ाई में अंक भी मिलते हैं। इससे गांवों में सीखने का यह मॉडल और मजबूत हुआ है।

गांवों से सीख रही है दुनिया

एक समय था जब गांवों को विकास की मुख्यधारा से पीछे माना जाता था। आज वही गांव दुनिया के छात्रों के लिए सीखने का केंद्र बन रहे हैं।

खेती, लोक संस्कृति, महिला उद्यमिता, सामुदायिक सहयोग और स्थानीय ज्ञान जैसी चीजें अब विदेशी छात्रों की पढ़ाई का हिस्सा बन रही हैं। इससे गांवों को नई पहचान, स्थानीय उत्पादों को नया बाजार और ग्रामीण परिवारों को अतिरिक्त आय मिल रही है।

जब दुनिया की बड़ी यूनिवर्सिटियों के छात्र सीखने के लिए भारतीय गांवों का रुख कर रहे हैं, तब यह साफ दिखाई देता है कि गांव केवल विकास की कहानी नहीं हैं, बल्कि वे ज्ञान, अनुभव और नवाचार के ऐसे केंद्र हैं, जहां से पूरी दुनिया सीख सकती है।

लेखिका: एंजल कटारिया

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