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विधायिका लोकतंत्र की धड़कन, जनता की शक्ति पवित्र धरोहर – देवनानी

गाँव मंच डेस्क जयपुर, 20 जनवरी।

राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने कहा कि विधायिका भारतीय लोकतंत्र की धड़कन है और हमारे हाथों में जो शक्ति है, वह जनता द्वारा सौंपी गई पवित्र धरोहर है। लोकतंत्र की सबसे मजबूत नींव जनता का अडिग विश्वास होता है, जिसे पारदर्शिता, संवाद और उत्तरदायित्वपूर्ण आचरण के माध्यम से ही बनाए रखा जा सकता है।

देवनानी लखनऊ में आयोजित 86वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन में “जनता के प्रति विधायिका की जवाबदेही” विषय पर संबोधित कर रहे थे। अपने विचारोत्तेजक संबोधन में उन्होंने विधायिका से आत्म-मूल्यांकन करने, लोक और तंत्र के सेतु को और अधिक सशक्त बनाने तथा भविष्य की चुनौतियों के लिए दूरदर्शी दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान किया।

विधायिका जनता की आकांक्षाओं का दर्पण

देवनानी ने कहा कि विधायिका कोई स्वतंत्र सत्ता केंद्र नहीं है, बल्कि यह जनता की आकांक्षाओं और अपेक्षाओं का प्रतिबिंब है। सदन में बैठने वाला प्रत्येक सदस्य केवल स्वयं का नहीं, बल्कि लाखों नागरिकों की सामूहिक आवाज का प्रतिनिधित्व करता है।

उन्होंने महात्मा गांधी के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि लोकतंत्र की वास्तविक कसौटी यह है कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक न्याय और अधिकार पहुंचे। जवाबदेही केवल चुनाव तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि प्रत्येक सत्र, बहस, प्रश्न और विधायी हस्तक्षेप में स्पष्ट रूप से दिखाई देनी चाहिए।

संवैधानिक नैतिकता व्यवहार में दिखनी चाहिए

विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि संवैधानिक नैतिकता केवल लिखित शब्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विधायकों के रोजमर्रा के कार्यों और निर्णयों में प्रतिबिंबित होनी चाहिए। जब जनप्रतिनिधि सदन में बैठते हैं, तो उन्हें संविधान के ट्रस्टी के रूप में व्यवहार करना चाहिए, क्योंकि उन्हें मिली शक्ति जनता की अमानत है।

अल्पमत की आवाज से तय होती है सदन की गरिमा

देवनानी ने स्पष्ट किया कि किसी सदन की श्रेष्ठता बहुमत की संख्या से नहीं, बल्कि अल्पमत की आवाज को दिए गए सम्मान से मापी जाती है। असहमति और स्वस्थ आलोचना लोकतंत्र को मजबूत बनाती हैं। संवाद और वाद-विवाद को उन्होंने विधायिका की जवाबदेही के सबसे मजबूत स्तंभ बताया।

उन्होंने कार्यपालिका पर प्रभावी नियंत्रण को विधायिका का प्रमुख संवैधानिक दायित्व बताते हुए कहा कि जनता के कर से एकत्र प्रत्येक रुपये का उपयोग जनकल्याण में हो, यह सुनिश्चित करना विधायिका की जिम्मेदारी है। प्रश्नकाल, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव और शून्यकाल को उन्होंने जनता की आवाज का सशक्त माध्यम बताया।

विधायी समितियां ‘लघु सदन’ की भूमिका में

विधानसभा अध्यक्ष ने विधायी समितियों को “लघु सदन” बताते हुए कहा कि यहां गहन, निष्पक्ष और तकनीकी समीक्षा संभव होती है। उन्होंने कहा कि समिति प्रतिवेदन केवल फाइलों तक सीमित न रहें, बल्कि उन पर सदन में गंभीर चर्चा हो और सरकार द्वारा की गई कार्रवाई की जानकारी अनिवार्य रूप से प्रस्तुत की जाए।

उन्होंने बताया कि राजस्थान विधानसभा ने लोक लेखा समिति और प्राक्कलन समिति के माध्यम से वित्तीय अनुशासन को मजबूत किया है। साथ ही सदस्यों के प्रशिक्षण, अभिमुखीकरण कार्यक्रम, बाल विधानसभा और यूथ पार्लियामेंट जैसी पहलों के जरिए भविष्य की पीढ़ी को लोकतांत्रिक मूल्यों से जोड़ा जा रहा है।

डिजिटल जवाबदेही के युग में राजस्थान विधानसभा

देवनानी ने राजस्थान विधानसभा द्वारा किए गए डिजिटल नवाचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि आज डिजिटल जवाबदेही का युग है। ऑनलाइन प्रक्रियाएं, पेपरलेस व्यवस्था, यूट्यूब पर सदन की कार्यवाही का सजीव प्रसारण और डिजिटल म्यूज़ियम जैसी पहलें पारदर्शिता को नई ऊंचाइयों तक ले जा रही हैं। उन्होंने इसे एक प्रकार का “सोशल ऑडिट” बताया, जो सदन को निरंतर सजग बनाए रखता है।

कानूनों के प्रभाव का आकलन जरूरी

विधानसभा अध्यक्ष ने लेजिस्लेटिव इम्पैक्ट असेसमेंट और पोस्ट-लेजिस्लेटिव ऑडिट की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि कानून बनने के बाद उनके वास्तविक प्रभाव का मूल्यांकन किया जाना चाहिए। जनता को नीति-निर्माण प्रक्रिया में सहभागी बनाना ही सच्ची जवाबदेही का सर्वोच्च स्वरूप है।

पीठासीन अधिकारी संविधान के संरक्षक

पीठासीन अधिकारियों की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि अध्यक्ष का आसन केवल संचालन करने वाला नहीं, बल्कि संविधान का संरक्षक होता है। नियमों की व्याख्या ऐसी होनी चाहिए जो चर्चा को सीमित करने के बजाय उसे विस्तार दे। सदन में सदस्यों की उपस्थिति, विधेयकों पर सार्थक चर्चा और संसदीय मर्यादाओं का पालन आत्म-मूल्यांकन के महत्वपूर्ण बिंदु हैं।

लोकतंत्र एक सतत यात्रा

देवनानी ने कहा कि लोकतंत्र कोई अंतिम मंज़िल नहीं, बल्कि एक निरंतर यात्रा है, जो जनता के विश्वास के ईंधन से आगे बढ़ती है। राजस्थान विधानसभा लोकतांत्रिक मूल्यों, विधायी मर्यादाओं और जनता के विश्वास की रक्षा के अपने संकल्प पर सदैव दृढ़ रहेगी।

उन्होंने सम्मेलन के सफल आयोजन के लिए उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना को बधाई दी और सभी प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया।

भारतीय लोकतंत्र और संसदीय प्रक्रियाओं की विस्तृत जानकारी के लिए भारत की संसद की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध संसाधन भी देखे जा सकते हैं।

राजस्थान में पंचायतों, ग्राम सभाओं और ग्रामीण योजनाओं से जुड़ी ताज़ा खबरें गाँव मंच के पंचायत सेक्शन में भी उपलब्ध हैं।

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