जयपुर। भारतीय कृषि क्षेत्र इस समय मौसम संबंधी जोखिमों के साथ-साथ वैश्विक कृषि जिंस बाजार में बढ़ती अनिश्चितता का सामना कर रहा है। कमजोर मानसून, कम जलाशय स्तर और अल नीनो की संभावित स्थिति से आने वाले रबी सीजन पर दबाव बढ़ने की आशंका है। हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के आकलन के अनुसार सिंचाई के विस्तार, फसल विविधीकरण, पशुपालन और मत्स्यपालन जैसी संबद्ध गतिविधियों तथा गैर-कृषि रोजगार के बढ़ने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मानसून पर निर्भरता पहले की तुलना में कम हुई है।

कमजोर मानसून ने बढ़ाई कृषि क्षेत्र की चिंता
- RBI की अक्टूबर 2026 की मौद्रिक नीति रिपोर्ट के अनुसार, इस वर्ष दक्षिण-पश्चिम मानसून का प्रदर्शन असमान रहा।
- जून में मानसून कमजोर रहने के बाद 9 जुलाई तक इसने पूरे देश को कवर कर लिया था।
- जुलाई में बारिश दीर्घकालिक औसत से करीब 1 प्रतिशत अधिक रही।
- हालांकि, 30 सितंबर तक देश में कुल वर्षा सामान्य से 12.6 प्रतिशत कम दर्ज की गई।
- रिपोर्ट के अनुसार सभी क्षेत्रों में बारिश सामान्य से नीचे रही, जिससे कृषि और जल उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ी है।
- मानसून की स्थिति का असर खास तौर पर उन क्षेत्रों पर पड़ सकता है जहां खेती अभी भी वर्षा पर अधिक निर्भर है।
जलाशयों में पानी का स्तर भी चिंता का विषय
- कम बारिश के साथ प्रमुख जलाशयों में पानी का स्तर भी सामान्य से नीचे रहा।
- RBI के अनुसार 1 अक्टूबर को प्रमुख जलाशयों में कुल जल भंडारण क्षमता का लगभग 71.8 प्रतिशत पानी उपलब्ध था।
- इसकी तुलना में सामान्य स्तर करीब 81.8 प्रतिशत और पिछले वर्ष इसी अवधि में 90.3 प्रतिशत था।
- जलाशयों में कम पानी का असर सिंचाई के साथ-साथ आगामी रबी फसल की बुवाई और उत्पादन पर भी पड़ सकता है।
- खासकर ऐसे क्षेत्रों में जहां कृषि सिंचाई के लिए जलाशयों पर निर्भरता अधिक है।
खरीफ फसलों की बुवाई में मामूली गिरावट
- 2 अक्टूबर तक खरीफ फसलों की कुल बुवाई पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में करीब 1 प्रतिशत कम रही। हालांकि,
- यह सामान्य क्षेत्रफल से लगभग 1 प्रतिशत अधिक थी।
- फसलवार स्थिति में धान, गन्ने और कपास के रकबे में कमी देखी गई। वहीं दलहन, मोटे अनाज और तिलहन के रकबे में बढ़ोतरी हुई।
- यह बदलाव फसल विविधीकरण की दिशा में भी संकेत देता है, खासकर ऐसी फसलों की ओर जिनकी पानी की आवश्यकता अपेक्षाकृत कम हो सकती है।
रबी सीजन के सामने भी चुनौतियां
- आने वाला रबी सीजन भी पूरी तरह जोखिम से मुक्त नहीं है। कम जलाशय स्तर के अलावा सामान्य से अधिक तापमान
- और अल नीनो की संभावित स्थिति कृषि उत्पादन के लिए चुनौती पैदा कर सकती है।
- गेहूं, चना, सरसों और अन्य रबी फसलों के लिए तापमान और मिट्टी में उपलब्ध नमी महत्वपूर्ण होती है।
- ऐसे में मौसम में असामान्य बदलाव उत्पादन और पैदावार को प्रभावित कर सकते हैं।
वैश्विक कृषि बाजारों में भी बढ़ी अनिश्चितता
- भारतीय कृषि के लिए चुनौती केवल घरेलू मौसम तक सीमित नहीं है। वैश्विक कृषि जिंस बाजारों में भी कई तरह के जोखिम बने हुए हैं।
- प्रमुख उत्पादक देशों में मौसम संबंधी व्यवधान, भू-राजनीतिक तनाव, बदलती व्यापार नीतियां तथा ऊर्जा
- और कृषि इनपुट की कीमतों में उतार-चढ़ाव वैश्विक मांग और आपूर्ति को प्रभावित कर रहे हैं।
- इन परिस्थितियों का असर अनाज, खाद्य तेल और अन्य कृषि जिंसों की अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर पड़ सकता है।
- इसका प्रभाव भारत में कृषि व्यापार, किसानों को मिलने वाली कीमतों और खाद्य महंगाई पर भी दिखाई दे सकता है।
वैश्विक कीमतों का भारत पर कैसे पड़ता है असर?
- भारत अंतरराष्ट्रीय कृषि बाजार से कई तरह से जुड़ा हुआ है। किसी प्रमुख उत्पादक देश में उत्पादन घटने पर वैश्विक कीमतें बढ़ सकती हैं।
- दूसरी ओर, किसी बड़े उत्पादक देश में बंपर उत्पादन होने पर कीमतों पर दबाव आ सकता है।
- आयातित कृषि जिंसों और कृषि इनपुट की कीमतों में बदलाव का असर घरेलू बाजार और किसानों की लागत पर भी पड़ता है।
- इसलिए वैश्विक बाजार में होने वाला उतार-चढ़ाव भारत के कृषि क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण है।
रिकॉर्ड खाद्यान्न उत्पादन से मिली राहत
- इन चुनौतियों के बावजूद भारत का कृषि प्रदर्शन अपेक्षाकृत मजबूत बना हुआ है।
- RBI के अनुसार 2025-26 के तीसरे अग्रिम अनुमान में खाद्यान्न उत्पादन 3,766 लाख टन रहने का अनुमान है,
- जो पिछले वर्ष की तुलना में करीब 5.3 प्रतिशत अधिक है।
- कपास को छोड़कर प्रमुख फसलों के उत्पादन में वृद्धि का अनुमान है।
- बागवानी क्षेत्र में भी सकारात्मक तस्वीर सामने आई है। 2025-26 में बागवानी उत्पादन करीब 3,778 लाख टन रहने का अनुमान है,
- जो 2024-25 के अंतिम अनुमान से लगभग 1.9 प्रतिशत अधिक है।
- केला, आम, आलू, टमाटर और अन्य सब्जियों के उत्पादन में बढ़ोतरी को इसके प्रमुख कारणों में शामिल किया गया है।
MSP बढ़ोतरी से फसल विविधीकरण को बढ़ावा
- सरकार ने 2026-27 के विपणन सत्र के लिए खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य
- (MSP) में करीब 0.1 से 8.8 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की है।
- वहीं 2027-28 के लिए रबी फसलों के MSP में लगभग 1 से 10.3 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की गई है।
- MSP में बदलाव का उद्देश्य किसानों को बेहतर मूल्य संकेत देने के साथ-साथ फसल विविधीकरण को प्रोत्साहित करना
- और कुछ कृषि जिंसों में मांग-आपूर्ति के असंतुलन को कम करना भी है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था अब सिर्फ खेती पर निर्भर नहीं
- RBI के विश्लेषण का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे कृषि उत्पादन से आगे बढ़ रही है।
- एक एकड़ तक की जोत वाले परिवारों में मजदूरी से होने वाली आय कुल घरेलू आय का 55 प्रतिशत से अधिक है।
- वहीं फसल उत्पादन और पशुधन मिलकर करीब 36 प्रतिशत आय में योगदान करते हैं।
- इससे संकेत मिलता है कि छोटे और सीमांत कृषि परिवारों की
- आय में गैर-कृषि और मजदूरी गतिविधियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है।
सिंचाई और संबद्ध गतिविधियों से घट रही मानसून पर निर्भरता
- RBI के अनुसार सिंचाई सुविधाओं का विस्तार, मौसम के अनुकूल फसल किस्मों का उपयोग
- और कम पानी वाली फसलों की ओर विविधीकरण ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मौसम संबंधी झटकों से बचाने में मदद कर रहा है।
- इसके अलावा पशुपालन, मत्स्यपालन और
- अन्य संबद्ध गतिविधियों का विस्तार भी किसानों की आय के स्रोतों को विविध बना रहा है।
- जिन वर्षों में बारिश सामान्य से 7 प्रतिशत से अधिक कम रहती है,
- वहां गैर-कृषि गतिविधियां ग्रामीण आर्थिक वृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं।
खाद्य महंगाई के लिए मौसम अब भी बड़ा जोखिम
- ग्रामीण अर्थव्यवस्था के अधिक विविध होने के बावजूद खाद्य महंगाई के लिए मौसम एक महत्वपूर्ण जोखिम बना हुआ है।
- कमजोर मानसून, कम जलाशय स्तर, संभावित अल नीनो
- और वैश्विक कृषि बाजार में व्यवधान खाद्य आपूर्ति को प्रभावित कर सकते हैं।
- यदि उत्पादन या आपूर्ति प्रभावित होती है तो इसका असर कृषि जिंसों की कीमतों
- और अंततः उपभोक्ताओं की खाद्य महंगाई पर पड़ सकता है।
अधिक जानकारी के लिए यहां क्लिक करें
https://www.rbi.org.in/Scripts/AnnualPublications.aspx
Edited by – Riddhima


