गांव मंच डेस्क | केरल
केरल का कुट्टनाड इलाका, जिसे देश की “धान की कटोरी” कहा जाता है, आज एक गंभीर कृषि संकट के मुहाने पर खड़ा है। हालिया मिट्टी परीक्षणों में कुट्टनाड के धान के खेतों में एल्यूमिनियम का स्तर सुरक्षित सीमा से 39 से 165 गुना अधिक पाया गया है।
विश्लेषण के अनुसार मिट्टी में एल्यूमिनियम की मात्रा 77.51 ppm से लेकर 334.10 ppm तक दर्ज की गई है, जो फसलों और किसानों—दोनों के लिए खतरे की घंटी है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति अचानक नहीं बनी, बल्कि वर्षों से बढ़ती मिट्टी की अम्लीयता (Soil Acidity) इसका मुख्य कारण है। जब मिट्टी का pH स्तर गिरता है, तो उसमें मौजूद एल्यूमिनियम घुलनशील रूप में बदल जाता है, जो पौधों की जड़ों के लिए ज़हर की तरह काम करता है।
धान की फसल पर सीधा असर
कुट्टनाड के किसान पहले ही जलभराव, जलवायु परिवर्तन और लागत बढ़ने जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। अब एल्यूमिनियम विषाक्तता ने हालात और गंभीर बना दिए हैं।
अत्यधिक एल्यूमिनियम जड़ों की बढ़वार रोकता है, जिससे पौधे पोषक तत्वों और पानी को सही तरीके से नहीं ले पाते। इसका नतीजा—कम उपज, कमजोर पौधे और कई जगह पूरी फसल का नुकसान।
स्थानीय किसानों का कहना है कि बीते कुछ वर्षों में धान की पैदावार लगातार घट रही है, लेकिन इसकी असली वजह अब जाकर सामने आ रही है। “हम मेहनत वही कर रहे हैं, लेकिन खेत जवाब दे रहे हैं,” एक किसान ने बताया।
किसानों की आजीविका पर खतरा
कुट्टनाड सिर्फ एक कृषि क्षेत्र नहीं, बल्कि हजारों किसानों की आजीविका का आधार है। धान की फसल पर निर्भर परिवारों के लिए यह संकट केवल खेती का नहीं, बल्कि रोज़गार और भविष्य का सवाल बन गया है। बढ़ती लागत और घटती पैदावार ने किसानों को कर्ज के जाल में धकेलना शुरू कर दिया है।
नीति और निगरानी की कमी
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यह समस्या समय रहते रोकी जा सकती थी, अगर मिट्टी की नियमित जांच, संतुलित उर्वरक उपयोग और सुधारात्मक उपायों पर ध्यान दिया गया होता। अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों के इस्तेमाल और जल प्रबंधन की कमजोर नीतियों ने मिट्टी की सेहत को लगातार नुकसान पहुंचाया है।
अब विशेषज्ञ सरकारी हस्तक्षेप की तत्काल मांग कर रहे हैं।
उनका कहना है कि
- मिट्टी की अम्लीयता कम करने के लिए वैज्ञानिक उपाय
- किसानों को सही जानकारी और सहायता
- दीर्घकालिक भूमि प्रबंधन नीति
बिना देरी लागू की जानी चाहिए।
धान की कटोरी को बचाने की चुनौती
कुट्टनाड का संकट सिर्फ केरल का मुद्दा नहीं है। यह देश की कृषि नीति के लिए एक चेतावनी है कि अगर मिट्टी को नज़रअंदाज़ किया गया, तो खाद्य सुरक्षा भी खतरे में पड़ सकती है। यह समय है जब सरकार, वैज्ञानिक संस्थान और किसान मिलकर समाधान की दिशा में कदम उठाएं। क्योंकि अगर मिट्टी ज़हरीली हो गई, तो सिर्फ फसल नहीं—पूरा भविष्य प्रभावित होगा।


