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यूजीसी के नए नियमों पर गतिरोध क्यों, जाने कारण और प्रभाव

गाँव मंच डेस्क, दिल्ली। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने 2025 में उच्च शिक्षा में सुधार के लिए नए ड्राफ्ट नियम जारी किए थे, जिनमें वाइस-चांसलर की नियुक्ति, जाति-आधारित भेदभाव रोकने के नियम (एंटी-डिस्क्रिमिनेशन रूल्स) और समता संवर्धन (इक्विटी प्रमोशन) से जुड़े प्रावधान शामिल हैं। 2026 में इन नियमों को अंतिम रूप दिया गया है, लेकिन ये अब भी विवादों में घिरे हुए हैं।

यूजीसी का दावा है कि ये नियम उच्च शिक्षा में समानता, गुणवत्ता और समावेशिता सुनिश्चित करेंगे। लेकिन विपक्षी शासित राज्यों (जैसे तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, तेलंगाना, पंजाब और पश्चिम बंगाल), शिक्षक संगठनों, छात्रों और सामान्य वर्ग के कुछ समूहों से तीव्र विरोध हो रहा है। कई राज्यों ने संयुक्त प्रस्ताव पारित कर इन नियमों को वापस लेने की मांग की है।

विरोध के मुख्य कारण

  1. राज्यों की स्वायत्तता का हनन और संघीय ढांचे पर हमला नए नियमों में वाइस-चांसलर (वीसी) की नियुक्ति में राज्य सरकारों की भूमिका को लगभग खत्म कर दिया गया है। अब चांसलर (ज्यादातर राज्यपाल) को पैनल से वीसी चुनने का पूरा अधिकार मिल जाता है, जबकि पहले राज्य सरकार की सलाह अनिवार्य थी। विरोधी इसे संघीय सिद्धांतों का उल्लंघन मानते हैं। तमिलनाडु के शिक्षा मंत्री ने इसे “तानाशाही” बताया है। छह विपक्षी राज्यों ने 15 सूत्री प्रस्ताव पारित कर कहा कि इससे राज्य विधानसभाओं के अधिकारों पर आघात होता है और राजनीतिक नियुक्तियों का खतरा बढ़ता है। कई राज्य पहले से ही राज्यपाल और सरकार के बीच विवादों से जूझ रहे हैं।
  2. अत्यधिक केंद्रीकरण और अकादमिक स्वतंत्रता पर खतरा ये नियम उच्च शिक्षा में केंद्र सरकार के नियंत्रण को बढ़ाते हैं, जो राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के तहत यूजीसी को हाईएर एजुकेशन कमीशन ऑफ इंडिया (एचईसीआई) से बदलने के प्रयास का हिस्सा माने जाते हैं।
  3. विरोधी कहते हैं कि इससे विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता कम होगी, अकादमिक अखंडता प्रभावित होगी और नवाचार रुक सकता है। कर्नाटक के उच्च शिक्षा मंत्री ने इसे राज्य की शिक्षा व्यवस्था पर “गंभीर हमला” कहा है। शिक्षक यूनियनों का आरोप है कि यह “कॉर्पोरेट-हिंदुत्व” एजेंडे को लागू करने का तरीका है।
  4. जाति-आधारित पूर्वाग्रह और सामान्य वर्ग के खिलाफ पक्षपात समता संवर्धन नियमों (Promotion of Equity Regulations 2026) में एससी/एसटी/ओबीसी के खिलाफ भेदभाव पर सख्त प्रावधान हैं, जैसे हर परिसर में इक्विटी कमेटी का गठन, हेल्पलाइन और दंड। लेकिन सामान्य वर्ग (जैसे ब्राह्मण आदि) के लिए कोई समान सुरक्षा नहीं है।
  5. विरोधी इसे संवैधानिक समानता (अनुच्छेद 15) का उल्लंघन मानते हैं। उनका कहना है कि नियम सामान्य वर्ग को दोषी मानने की पूर्वधारणा रखते हैं, जिससे झूठी शिकायतों का खतरा बढ़ेगा। अंतिम नियमों में झूठी शिकायत पर जुर्माने का प्रावधान हटा दिया गया है, जो विरोध को और बढ़ा रहा है।
  6. झूठी शिकायतों के खिलाफ कोई सुरक्षा न होना एंटी-डिस्क्रिमिनेशन नियम एससी/एसटी शिकायतों को प्राथमिकता देते हैं, लेकिन झूठे आरोपों से बचाव के लिए कोई मजबूत प्रक्रिया नहीं है। इससे सामान्य वर्ग के शिक्षकों और कर्मचारियों पर अनुचित दबाव पड़ सकता है।विरोधी कहते हैं कि इससे विश्वविद्यालयों में लंबे मुकदमे चलेंगे, प्रशासन ठप हो सकता है और शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होगी। कई विश्वविद्यालय पहले से ही स्थायी वीसी के बिना चल रहे हैं।
  7. राजनीतिक और वैचारिक प्रभाव विरोध केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक भी है। गैर-बीजेपी राज्य इसे केंद्र द्वारा शिक्षा (समवर्ती सूची विषय) पर नियंत्रण बढ़ाने की कोशिश मानते हैं। कुछ सुझाव देते हैं कि शिक्षा को राज्य सूची में वापस लाया जाए। दिल्ली यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन (दूता) जैसे संगठन लगातार विरोध कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर बहस है कि ये नियम विभाजन पैदा करेंगे, न कि समावेश बढ़ाएंगे।

यूजीसी और सरकार का पक्ष

यूजीसी का कहना है कि ये नियम भेदभाव-मुक्त, समान और गुणवत्ता-आधारित शिक्षा सुनिश्चित करेंगे। केंद्र सरकार इन्हें एनईपी के लक्ष्यों के अनुरूप बताती है। नए नियमों में इक्विटी कमेटियां, दंड और हेल्पलाइन जैसे प्रावधान जाति-आधारित अन्याय को रोकने के लिए हैं।

यूजीसी के 2025-2026 नियम उच्च शिक्षा में सुधार लाने का प्रयास हैं, लेकिन इनसे राज्यों की स्वायत्तता, अकादमिक स्वतंत्रता और सामाजिक समानता पर गंभीर सवाल उठे हैं। यदि संवाद न हुआ तो ये नियम मुकदमों, विरोध और शिक्षा व्यवस्था में अस्थिरता का कारण बन सकते हैं।

हितधारकों को सुझाव है कि नियमों में संशोधन हो, झूठी शिकायतों पर दंड का प्रावधान जोड़ा जाए और राज्यों की भूमिका को सम्मान दिया जाए। इससे उच्च शिक्षा मजबूत और समावेशी बन सकती है।

नोट:- यह लेखक अंकित तिवारी के विचार है

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