गांव मंच डेस्क | नई दिल्ली | राजस्थान के किसान रामलाल हर साल गेहूं और सरसों की खेती करते हैं। फसल अच्छी हो जाए तो आमदनी ठीक रहती है, लेकिन एक खर्च ऐसा है जो हर सीजन उनकी जेब पर भारी पड़ता है—खाद।
यूरिया, डीएपी और दूसरी रासायनिक खादों के बिना खेती मुश्किल है। लेकिन क्या हो अगर आने वाले वर्षों में इन पर निर्भरता कुछ कम हो जाए और खेती की लागत भी घटने लगे?
केंद्र सरकार की नई कृषि सुधार पहल इसी दिशा में एक कदम मानी जा रही है।
सरकार क्या बदलना चाहती है?
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने किसानों, व्यापारियों और कृषि क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए प्रक्रियाओं को आसान बनाने की घोषणा की है। सरकार का लक्ष्य कृषि प्रशासन को अधिक पारदर्शी, डिजिटल और सरल बनाना है। इसके तहत खाद पंजीकरण जैसी प्रक्रियाओं को आसान बनाने और कई सेवाओं को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाने की तैयारी है। 2026 में शुरू किए गए एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अब तक 44 लाख से अधिक प्रश्नों का निपटारा किया जा चुका है।
आखिर खाद का मुद्दा इतना बड़ा क्यों है?
रामलाल जैसे किसानों के लिए खाद सिर्फ खेती का साधन नहीं, बल्कि लागत का बड़ा हिस्सा है।
भारत हर साल उर्वरक सब्सिडी पर भारी रकम खर्च करता है। सरकार ने केवल खरीफ 2026 सीजन के लिए ही लगभग ₹41,534 करोड़ की पोषक तत्व आधारित सब्सिडी (NBS) को मंजूरी दी है। वहीं 2025-26 में जुलाई तक किसानों को सस्ती खाद उपलब्ध कराने के लिए ₹49,330 करोड़ से अधिक की सब्सिडी दी जा चुकी थी।
यानी सरकार और किसान दोनों की जेब पर खाद का बड़ा असर पड़ता है।
जैव उर्वरक क्या हैं और सरकार इन्हें क्यों बढ़ावा दे रही है?
जैव उर्वरक (Bio-fertiliser) ऐसे उत्पाद हैं जिनमें लाभकारी सूक्ष्म जीव होते हैं। ये मिट्टी को प्राकृतिक तरीके से पोषण देने में मदद करते हैं।
सरकार का मानना है कि यदि किसान रासायनिक खादों के साथ जैव उर्वरकों का संतुलित उपयोग करें तो
- मिट्टी की सेहत सुधर सकती है।
- रासायनिक खाद की जरूरत कम हो सकती है।
- खेती की लागत घट सकती है।
- पर्यावरण पर दबाव कम हो सकता है।

जैव उर्वरकों और प्राकृतिक खाद के उपयोग को बढ़ावा देने की दिशा में किसानों को टिकाऊ खेती के तरीकों से जोड़ने की कोशिश की जा रही है।
पुरानी नीति और नई सोच में क्या फर्क है?
पहले
सरकार का मुख्य लक्ष्य था
- किसानों को सस्ती यूरिया उपलब्ध कराना
- उत्पादन बढ़ाना
- खाद पर सब्सिडी देना
अब
नई सोच कहती है
- सिर्फ उत्पादन नहीं, टिकाऊ उत्पादन भी जरूरी है।
- मिट्टी की सेहत बचानी होगी।
- रासायनिक खादों पर अत्यधिक निर्भरता कम करनी होगी।
- पर्यावरण और खेती दोनों को साथ लेकर चलना होगा।
यानी फोकस “ज्यादा खाद , ज्यादा उत्पादन” से हटकर “संतुलित खाद , टिकाऊ खेती” की ओर बढ़ रहा है।
प्राकृतिक गैस का खेती से क्या संबंध है?
यह बात कई किसानों को पता नहीं होती।
यूरिया बनाने में प्राकृतिक गैस का उपयोग होता है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। सरकार के अधिकारियों के अनुसार भारत अभी भी उर्वरक और प्राकृतिक गैस के लिए वैश्विक बाजारों पर काफी हद तक निर्भर है। अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढ़ने पर खाद उत्पादन महंगा हो जाता है और सरकार पर सब्सिडी का बोझ भी बढ़ता है।
यही वजह है कि सरकार जैव उर्वरकों और वैकल्पिक तकनीकों को बढ़ावा देना चाहती है।
क्या किसानों को तुरंत फायदा होगा?
सच कहें तो नहीं।
रामलाल अगर आज से जैव उर्वरकों का उपयोग शुरू कर दें, तो अगले सीजन में कोई बड़ा बदलाव दिखाई नहीं देगा।
लेकिन 2-3 साल में
- मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर हो सकती है।
- रासायनिक खाद की मात्रा घट सकती है।
- लागत पर सकारात्मक असर पड़ सकता है।
- उत्पादन स्थिर रखने में मदद मिल सकती है।
क्या इसके कुछ प्रमाण भी हैं?
देश में नैनो यूरिया और वैकल्पिक उर्वरकों का उपयोग बढ़ रहा है। सरकार के अनुसार दिसंबर 2025 तक 11.85 करोड़ से अधिक नैनो यूरिया की बोतलें बिक चुकी थीं। कुछ अध्ययनों में पारंपरिक यूरिया के साथ इनके उपयोग से फसल उत्पादन में 1.65% से 14.82% तक वृद्धि दर्ज की गई है। हालांकि विशेषज्ञ इसे पूरी तरह रासायनिक खाद का विकल्प नहीं मानते।
चुनौतियां क्या हैं?
नई नीति के सामने कुछ बड़ी चुनौतियां भी हैं
- कई किसानों को जैव उर्वरकों की जानकारी नहीं है।
- ग्रामीण क्षेत्रों में उपलब्धता अभी सीमित है।
- परिणाम धीरे-धीरे दिखाई देते हैं।
- किसानों को प्रशिक्षण और सलाह की जरूरत होगी।
- सभी फसलों और सभी क्षेत्रों में एक जैसा असर नहीं दिखेगा।
किसानों के लिए इसका मतलब क्या है?
रामलाल जैसे किसानों के लिए यह नीति सिर्फ सरकारी घोषणा नहीं है। इसका उद्देश्य खेती को कम लागत वाली, मिट्टी के लिए बेहतर और भविष्य के लिए टिकाऊ बनाना है।
हालांकि यह बदलाव एक-दो साल में पूरी तरह दिखाई नहीं देगा, लेकिन अगर जैव उर्वरकों का उपयोग बढ़ता है और प्रशासनिक प्रक्रियाएं आसान होती हैं, तो किसानों की लागत कम करने और खेती को अधिक लाभकारी बनाने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।


