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किशाऊ डैम: क्या राजस्थान की प्यास अब बुझेगी?

पानी के संकट से उम्मीद तक का सफर

  • एक समय था जब राजस्थान के कई गांवों में पानी के लिए हाहाकार मचा रहता था।
  • कुएं सूख जाते थे, हैंडपंप जवाब दे देते थे और लोगों को टैंकरों या पानी वाली ट्रेनों का इंतजार करना पड़ता था।
  • हालात पहले से बेहतर जरूर हुए हैं, लेकिन आज भी कई ग्रामीण इलाकों में किसान और परिवार बूंद-बूंद पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

32 साल पुरानी परियोजना को मिली रफ्तार

  • इसी बीच 32 साल पुराना किशाऊ मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट राजस्थान के लिए नई उम्मीद बनकर सामने आया है।
  • यह परियोजना उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर टोंस नदी पर प्रस्तावित है, जो यमुना की सबसे बड़ी सहायक नदी है।
  • साल 1994 के यमुना जल समझौते के बाद शुरू हुई यह योजना लंबे समय तक फाइलों में अटकी रही।
  • अब छह राज्यों के बीच सहमति बनने के बाद इसे आगे बढ़ाने की तैयारी है।

राजस्थान और किसानों को क्या फायदा?

  • इस परियोजना से राजस्थान को करीब 201 मिलियन क्यूबिक मीटर (MCM) पानी मिलने की संभावना है।
  • यह पानी उन इलाकों तक पहुंच सकता है जहां किसान आज भी मानसून के भरोसे खेती करते हैं।
  • सिंचाई सुविधाएं बढ़ने से फसल उत्पादन और किसानों की आय में सुधार हो सकता है।

विकास पर समर्थन, सवाल भी जारी

  • गाँव मंच मानता है कि सरकार से खाद, बीज और किसानों की समस्याओं पर सवाल पूछना जरूरी है।
  • लेकिन जब कोई परियोजना सीधे गांवों, किसानों और पानी की जरूरत से जुड़ी हो,
  • तो उसके सकारात्मक प्रभाव को भी स्वीकार करना चाहिए।

राजस्थान के लिए नई उम्मीद

  • अगर यह परियोजना समय पर पूरी होती है, तो यह सिर्फ एक बांध नहीं बल्कि राजस्थान के जल भविष्य को मजबूत करने वाला बड़ा कदम साबित हो सकती है।

लेखिका- तनु रूंगटा

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