गांव मंच डेस्क, जयपुर सुबह सूरज निकलने से पहले खेत की ओर जाने वाला किसान शायद पर्यावरण शब्द का ज्यादा इस्तेमाल न करता हो, लेकिन उसका पूरा जीवन पर्यावरण पर ही टिका होता है। उसकी उम्मीदें बादलों से जुड़ी होती हैं, उसकी मेहनत मिट्टी में पसीने के साथ मिलती है और उसकी खुशियां खेतों में लहलहाती फसलों के साथ बढ़ती हैं। इसलिए 5 जून को मनाया जाने वाला विश्व पर्यावरण दिवस किसानों के लिए सिर्फ एक विशेष दिन नहीं, बल्कि अपनी जिंदगी और भविष्य के बारे में सोचने का अवसर भी है।
मौसम बदल रहा है
गांवों में अक्सर बुजुर्ग कहते हैं कि पहले मौसम का अपना एक नियम था। किसान जानता था कि कब बारिश होगी और कब बुवाई करनी है। लेकिन अब यह भरोसा कमजोर पड़ता जा रहा है। कभी भीषण गर्मी फसलों को झुलसा देती है, तो कभी अचानक बारिश या ओलावृष्टि महीनों की मेहनत को नुकसान पहुंचा देती है। पानी का स्तर लगातार नीचे जा रहा है और कई जगह मिट्टी की ताकत भी कम होती दिख रही है। इन बदलावों का सबसे ज्यादा असर उस किसान पर पड़ता है, जिसकी रोजी-रोटी खेती पर निर्भर है।

खेती का भविष्य सुरक्षित होगा
आज देश के कई किसान ऐसे तरीके अपना रहे हैं जो पर्यावरण और खेती दोनों के लिए फायदेमंद हैं। कोई खेत की मेड़ों पर पेड़ लगा रहा है, कोई बारिश के पानी को सहेज रहा है, तो कोई रासायनिक खादों पर निर्भरता कम करके प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ रहा है। ये छोटे कदम दिखने में साधारण लग सकते हैं, लेकिन आने वाले वर्षों में यही प्रयास खेती को मजबूत बनाने की नींव बनेंगे। स्वस्थ मिट्टी, स्वच्छ पानी और हरियाली ही अच्छी फसल की असली पूंजी हैं।
एक पौधा, एक संकल्प और बेहतर कल
विश्व पर्यावरण दिवस हमें याद दिलाता है कि धरती सिर्फ हमारी नहीं, आने वाली पीढ़ियों की भी है। यदि आज हम पेड़-पौधों, जल स्रोतों और मिट्टी का संरक्षण करेंगे, तो हमारे बच्चे भी हरे-भरे खेत और स्वच्छ वातावरण देख पाएंगे। इस बार पर्यावरण दिवस पर कोई बड़ा वादा करने की जरूरत नहीं है। बस एक पौधा लगाना, पानी की बर्बादी रोकना और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी महसूस करना ही एक अच्छी शुरुआत हो सकती है। क्योंकि जब धरती स्वस्थ रहेगी, तभी किसान खुशहाल रहेगा और तभी देश की थाली भरी रहेगी।
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