गाँव मंच डेस्क दिल्ली, 6 अप्रैल | देश के कई हिस्सों में किसान बिना मिट्टी की जांच कराए लगातार खेती कर रहे हैं, जिससे धीरे-धीरे जमीन की उर्वरता कम होती जा रही है और उत्पादन पर भी नकारात्मक असर पड़ रहा है। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि यह एक “silent loss” है, जिसे किसान अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, एक ही तरह की फसल बार-बार उगाने और बिना सही पोषक तत्वों के इस्तेमाल से मिट्टी में असंतुलन पैदा हो जाता है। इसका सीधा असर फसल की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों पर पड़ता है।
मिट्टी की जांच क्यों है जरूरी?
मिट्टी की जांच से यह पता चलता है कि जमीन में कौन-कौन से पोषक तत्वों की कमी है। इसके आधार पर किसान सही मात्रा में उर्वरक का उपयोग कर सकते हैं, जिससे लागत भी कम होती है और उत्पादन भी बेहतर होता है।

किसानों की सबसे बड़ी गलती
अधिकांश किसान बिना जांच के ही खाद और उर्वरक डालते हैं। इससे कई बार जरूरत से ज्यादा या गलत तत्व मिट्टी में चले जाते हैं, जिससे जमीन धीरे-धीरे कमजोर होती जाती है।
क्या कहते हैं कृषि विशेषज्ञ?
विशेषज्ञों के अनुसार, हर 2–3 साल में एक बार मिट्टी की जांच कराना जरूरी है। इससे किसान अपनी जमीन की स्थिति को समझ सकते हैं और उसी हिसाब से खेती की योजना बना सकते हैं।
सरकार की पहल
सरकार द्वारा मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना चलाई जा रही है, जिसके तहत किसानों को उनकी जमीन की पूरी रिपोर्ट दी जाती है। इस योजना का उद्देश्य किसानों को वैज्ञानिक तरीके से खेती के लिए प्रोत्साहित करना है।
जमीन पर असली असर
जहां किसानों ने मिट्टी की जांच के आधार पर खेती शुरू की है, वहां उत्पादन में सुधार और लागत में कमी देखने को मिली है। इससे किसानों की आय पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ा है।
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– Manisha Bhambhu , Journalist


