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बायोचार: पराली के धुएं को ‘काले सोने’ में बदलने का आसान समाधान

  • गांव मंच डेस्क, राजस्थान
  • भारत की खेती आज एक बड़ी चुनौती का सामना कर रही है।
  • खेतों में निकलने वाला कृषि अवशेष किसानों के लिए परेशानी बन गया है। खासकर पंजाब और हरियाणा में हर साल 2 करोड़ टन से अधिक धान की पराली जलाई जाती है।
  • इससे भारी मात्रा में धुआं निकलता है। परिणामस्वरूप वायु प्रदूषण बढ़ता है।

आखिर क्या है बायोचार?

  • बायोचार एक कार्बन युक्त पदार्थ है। इसे फसल अवशेष, लकड़ी, गोबर या अन्य जैविक सामग्री से बनाया जाता है।
  • इसके लिए ऑक्सीजन की कम मात्रा में उच्च तापमान पर सामग्री को गर्म किया जाता है। इस प्रक्रिया को पायरोलिसिस कहा जाता है।
  • इसके बाद जो काला पदार्थ प्राप्त होता है, उसे बायोचार कहते हैं। कई विशेषज्ञ इसे “ब्लैक गोल्ड” यानी काला सोना भी कहते हैं।
  • क्योंकि यह मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने में बेहद उपयोगी साबित हो रहा है।

मिट्टी की सेहत और किसानों की आय दोनों को फायदा

  • बायोचार मिट्टी में कार्बन की मात्रा बढ़ाता है। इससे मिट्टी की जलधारण क्षमता बेहतर होती है। साथ ही, पोषक तत्व लंबे समय तक मिट्टी में बने रहते हैं।
  • नतीजतन रासायनिक उर्वरकों की जरूरत कम हो सकती है। कई शोध बताते हैं कि बायोचार के उपयोग से फसलों की उत्पादकता बढ़ सकती है।
  • इसके अलावा, यह मिट्टी में मौजूद लाभकारी सूक्ष्मजीवों को भी बढ़ावा देता है। इसलिए किसान कम लागत में बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।

जलवायु परिवर्तन से लड़ाई में भी मददगार

  • बायोचार केवल खेती के लिए ही नहीं, बल्कि पर्यावरण के लिए भी फायदेमंद है।
  • जब पराली जलाई जाती है, तब बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड वातावरण में पहुंचती है।
  • वहीं, बायोचार बनाने पर कार्बन लंबे समय तक मिट्टी में सुरक्षित रहता है। इसलिए इसे कार्बन सीक्वेस्ट्रेशन का प्रभावी तरीका माना जाता है।
  • यही कारण है कि दुनिया के कई देश इसे जलवायु परिवर्तन से निपटने के महत्वपूर्ण उपाय के रूप में देख रहे हैं।

भारत के लिए सुनहरा अवसर

  • भारत हर साल करोड़ों टन कृषि अवशेष पैदा करता है। यदि इस अवशेष को जलाने के बजाय बायोचार में बदला जाए, तो किसानों को अतिरिक्त आय मिल सकती है।
  • साथ ही, प्रदूषण कम होगा और मिट्टी की सेहत सुधरेगी। हालांकि इसके लिए मशीनों, प्रशिक्षण और सरकारी सहायता की जरूरत होगी।
  • फिर भी, विशेषज्ञ मानते हैं कि सही नीतियों और जागरूकता के जरिए बायोचार भारत की कृषि को अधिक टिकाऊ और लाभदायक बना सकता है।
  • ऐसे में पराली का धुआं सचमुच किसानों के लिए ‘काले सोने’ में बदल सकता है।

https://agricoop.nic.in
https://www.fao.org/soils-portal
https://www.pau.edu

Edited by- Krishika Agarwal

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