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यूरिया-DAP का खर्च होगा आधा! 45 दिन उगाएं ढैंचा ।

  • गांव मंच डेस्क, जयपुर खेती में लगातार बढ़ती लागत किसानों की सबसे बड़ी चिंता बन गई है। वहीं, रासायनिक खादों के अधिक उपयोग से मिट्टी की सेहत भी खराब हो रही है।
  • ऐसे में उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले की प्रगतिशील महिला किसान। सुचिता किसानों को ढैंचा की खेती अपनाने की सलाह दे रही हैं।
  • उनका कहना है कि यह फसल खेतों के लिए प्राकृतिक खाद का काम करती है। इससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है। साथ ही, यूरिया और DAP जैसी महंगी खादों कम हो जाता है।

क्या है ढैंचा और क्यों है इतना फायदेमंद?

  • ढैंचा एक हरी खाद वाली फसल है। इसे खेत में उगाकर बाद में मिट्टी में ही मिला दिया जाता है।
  • इसके बाद यह सड़कर जैविक खाद में बदल जाती है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, ढैंचा मिट्टी में प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन बढ़ाता है।
  • इतना ही नहीं, यह जैविक कार्बन की मात्रा भी बढ़ाने में मदद करता है।
  • इसके कारण मिट्टी अधिक भुरभुरी और उपजाऊ बनती है। यही वजह है कि इसे धान की खेती के लिए बेहद उपयोगी माना जाता है।

सिर्फ 45 दिन में तैयार, धान किसानों के लिए वरदान

  • ढैंचा की बुवाई आमतौर पर मई और जून में की जाती है। धान की रोपाई से लगभग 40 से 50 दिन पहले इसकी खेती शुरू की जाती है।
  • जब फसल 40 से 45 दिन की हो जाती है और फूल आने लगते हैं, तब इसे ट्रैक्टर, हल या रोटावेटर की मदद से खेत में ही मिला दिया जाता है।
  • इसके बाद खेत में पानी भर दिया जाता है। कुछ दिनों में यह फसल सड़कर पौष्टिक जैविक खाद बन जाती है। इससे धान की फसल को भरपूर पोषण मिलता है।

यूरिया-DAP की जरूरत घटती है, उत्पादन बढ़ता है

  • कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि ढैंचा की फसल एक हेक्टेयर भूमि में 40 से 60 किलोग्राम तक नाइट्रोजन उपलब्ध करा सकती है।
  • इसलिए रासायनिक खादों की आवश्यकता कम हो जाती है। इसके अलावा, मिट्टी की जलधारण क्षमता भी बढ़ती है।
  • वहीं, सूक्ष्म जीवों की संख्या में भी वृद्धि होती है। परिणामस्वरूप फसल की बढ़वार बेहतर होती है और उत्पादन पर सकारात्मक असर पड़ता है।

टिकाऊ खेती की ओर बढ़ता कदम

  • आज जब टिकाऊ खेती की जरूरत पहले से अधिक महसूस की जा रही है, तब ढैंचा किसानों के लिए एक सस्ता और प्रभावी विकल्प बनकर उभर रहा है।
  • यह न केवल मिट्टी को नया जीवन देता है, बल्कि खेती की लागत भी घटाता है।
  • इसलिए विशेषज्ञ भी किसानों को हरी खाद अपनाने की सलाह दे रहे हैं।
  • यदि किसान ढैंचा जैसी फसलों को अपनाएं, तो वे बेहतर उत्पादन के साथ लंबे समय तक अपनी जमीन की उर्वरता बनाए रख सकते हैं।

https://icar.org.in
https://www.iari.res.in
https://agriwelfare.gov.in

Edited by- Krishika Agarwal

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