गांव मंच डेस्क, जयपुर भारत की खाद सब्सिडी व्यवस्था फिर चर्चा में है। कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी ने मौजूदा मॉडल को अस्थिर बताया है। उनका कहना है कि किसानों को सस्ती खाद देने की जगह सीधे आय सहायता दी जानी चाहिए। इससे सरकारी खर्च भी घटेगा और संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा।
बढ़ता जा रहा है सब्सिडी का बोझ
केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 में खाद सब्सिडी के लिए 1.71 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। लेकिन पश्चिम एशिया में तनाव और वैश्विक कीमतों में तेजी से यह राशि 3 लाख करोड़ रुपये से भी ऊपर जा सकती है। कुछ सरकारी आकलनों में यह आंकड़ा 3.4 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने की आशंका जताई गई है।
आयात पर भारी निर्भरता बनी चुनौती
भारत हर साल बड़ी मात्रा में यूरिया आयात करता है। घरेलू उत्पादन के लिए भी प्राकृतिक गैस का बड़ा हिस्सा विदेशों से आता है। हाल के महीनों में वैश्विक बाजार में यूरिया की कीमतें तेजी से बढ़ी थीं। हालांकि चीन द्वारा निर्यात फिर शुरू करने के बाद कीमतों में कुछ नरमी आई है। इसके बावजूद भारत की आयात निर्भरता चिंता का विषय बनी हुई है।

किसानों को सस्ती खाद, सरकार पर भारी दबाव
देश में नीम-कोटेड यूरिया की कीमत वर्षों से लगभग स्थिर है। किसान इसे बेहद कम कीमत पर खरीदते हैं। अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढ़ने पर सरकार को अंतर भरना पड़ता है। यही कारण है कि वैश्विक संकट का सीधा असर सरकारी खजाने पर पड़ता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि मौजूदा व्यवस्था लंबे समय तक टिकाऊ नहीं है।
अशोक गुलाटी का सुझाव क्या है?
अशोक गुलाटी का मानना है कि खाद पर मूल्य आधारित सब्सिडी खत्म करनी चाहिए। इसके स्थान पर किसानों को प्रति एकड़ या प्रत्यक्ष आय सहायता दी जा सकती है। उनका कहना है कि इससे खाद का संतुलित उपयोग बढ़ेगा। साथ ही मिट्टी और पर्यावरण पर पड़ने वाला दबाव भी कम होगा। उन्होंने दलहन और तिलहन जैसी फसलों को बढ़ावा देने की भी वकालत की है।
सुधार की राह आसान नहीं
सरकार फिलहाल किसानों को राहत देने के लिए सब्सिडी जारी रखे हुए है। खरीफ 2026 के लिए 41,534 करोड़ रुपये की अतिरिक्त पोषक तत्व आधारित सब्सिडी भी मंजूर की गई है। लेकिन बढ़ती लागत और आयात निर्भरता ने सुधार की बहस को तेज कर दिया है। आने वाले वर्षों में खाद सब्सिडी नीति में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
Edited by- Krishika Agarwal


